लिखती हूँ लिखती हूँ!!

jj

लिखती हूँ
लिखती हूँ…
हाँ अभी तो लिखना शुरु ही किया है।
जिंदगी की ख्वाहिश थी कुछ लिख दूँ,
कुछ अधूरी बातें तो कुछ पूरी कहानी लिख दूँ।
कुछ जमाने की यातनाएँ लिख दूँ,
तो कुछ इस दिल की भावनाएं लिख दूँ।
बहुत कुछ लिखती पर शायद कुछ कम ही लिखती हूँ ।
मगर लिखती हूँ…
वो जिन्होंने उम्मीदों के आशियाने दिए,
हंसने मुस्कुराने के बहाने दिए,
तो तन्हाइयो से निकल जाने दिए।
बस उन्हीं की मरहम लिखती हूँ ।
लिखती हूँ …
इसलिए कि खुद को याद रख सकूँ,
मैं चली भी जाऊँ,
तो खुद को जीवित रख सकूँ।
मैं नहीं जानता कि अंत जाने क्या होगा, कैसा होगा ?
बस हर नए लम्हें कि हर एक उद्रम लिखती हूँ ।
मगर लिखती जरूर हूँ…
लिखती हूँ कभी कोई बात पुरानी,
कभी कोई बात सयाने,
तो कभी कोई यूँ ही बेमतलब-सी कहानी लिखती हूँ ।
बहुत कुछ लिखती पर शायद कुछ कम ही लिखती हूँ।
लिखती हूँ…।

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ऐ मेरे दोस्त!!

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ऐ मेरे दोस्त
ऐ मेरे दोस्त….
तू जिंदगी को लिख ले,
उसे पढने की तमन्ना छोड़ दे।
तू जिंदगी को जी ले,
उसे समझने की तमन्ना छोड़ दे।
खूबसूरत सपनों की माला बून ले,
उसमें उलझने की तमन्ना छोड़ दे।
ऐ मेरे दोस्त…
गुजर रहे वक्त़ के साथ, कभी तू भी चल ले,
उसमें सिमट जाने की तमन्ना छोड़ दे।
अपनी मुठ्ठी को खोल, सुनहरी हवा में खुल के सांस ले,
अंदर-ही-अंदर घुट जाने की तमन्ना छोड़ दे।
हृदय में चल रहे भय को बस यू ही पूर्ण विराम लगा ले,
खामख्वाह अपनों से लड़ने की तमन्ना छोड़ दे।
ऐ मेरे दोस्त…
कुछ बातें ईश्वर के हाथों सौप दे,
उसे खुद ही सुलझाने की तमन्ना छोड़ दे।
जो कुछ मिला इस जहाँ में, उसी में खुश रहना सीख ले,
जो नींद, चैन, सकून, और अपनों को छीन ले,
उसे पाने की तमन्ना छोड़ दे।
मंजिल को पाने से पहले उस खूबसूरत रास्ते का मजा ले,
सिर्फ मंज़िल पर पहुँचने की तमन्ना छोड़ दे।
ऐ मेरे दोस्त…

ये जिंदगी शायद बदल-सी रही है

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ये जिंदगी शायद बदल-सी रही है
आज ये अचानक मौसम को क्या हुआ है,
ये कितने खामोश से मालूम होते है।
ये पेड़ों के पत्ते भी न,
कुछ उदास से मालूम होते हैं।
शायद फूल भी नहीं खिलते पहले की तरह,
ये लगा सब कितने शांत से मालूम होते हैं।
पता नहीं ऐसा नजारा सब के लिए हुआ है,
या फिर मुझे ही कुछ हुआ है।
आज ये सूरज भी अचानक कहीं छिप-सा गया है,
ये चाँदनी की ठंडक भी कहीं गुम-सी गई है।
ये हवाओं का भी अपना रूख अचानक बदल-सा गया है,
या फिर मेरी आँखों में ही कुछ खटक-सी रही है।
ऐसा क्यूं लग रहा है कि,
आज कुछ अचानक बदल-सी रही है जिंदगी।
पहले तो नींद में ख्वाब आती थे,
अब तो ख्वाबों में भी ख्वाब आ जाते हैं।
नींद से मुझे जगाते हैं,
कुछ तो कहते नहीं ख्वाबों में भी
सिर्फ और सिर्फ रुलाते हैं।
ये जिंदगी शायद बदल-सी रही है।

जब मैं नन्हीं-सी परी थी!!

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जब मैं नन्हीं-सी परी थी
जब मैं नन्हीं-सी परी थी,
शायद ये दुनिया बहुत बड़ी-सी थी…
मुझे याद आता है वो बचपना,
जब मुझे स्कूल ले जाया जाता था।
मेरे घर से स्कूल तक का वो सफ़र,
आज का सबसे यादगार-सा वो पल…
शायद ये दुनिया अब खुद में सिमट-सी रही है।
जब मैं नन्हीं-सी परी थी,
शायद शाम की वक्त़ कुछ लंबी हुआ करती थी…
इसलिए तो अपनों के साथ घंटो खेला करती थी।
वो थक कर चूर हो जाना,
जैसी फितरत-सी बन गई थी।
शायद अब शाम नहीं हुआ करती…
सूरज ढलता है और सीधे रात होती है,
शायद यह वक्त़ भी अब खुद में सिमट-सी रही है।
जब मैं नन्हीं-सी परी थी,
शायद दोस्ती भी बहुत गहरी हुआ करती थी…
दिन भर साथ पढना, खेलना, सबकी बातें सुनना, हंसी- ठिठोली करना, साथ रोना और दोस्तो के घर जाना।
अब भी मेरे बहुत-से दोस्त हैं गिनने के लिए,
पर दोस्ती न जाने कहाँ खो-सी गई है।
अब तो जब भी मुलाकात होती है,
बस, हाय-हैलो हो जाती है…
और अपनी-अपनी राहें चल देते हैं।
शायद यह रिश्ते भी अब खुद में बदल-सी रही है।
जब मैं नन्हीं-परी थी,
तब हमेशा खेलने की चाहत रहती थी…
बारिश की बुंदो से जैसे गहरी मोहब्बत रहती थी,
लेकिन अब तो इंटरनेट से फुर्सत कहाँ मिलती है।
शायद यह जिंदगी भी अब खुद में बदल-सी रही है।
अक्सर कब्रिस्तान के बाहर लिखा हमने…
“मंजिल तो तेरी यही थी बस जिंदगी गुजर गई यहाँ आते आते।”
जिंदगी का हर लम्हा बहुत छोटा-सा है…
बीते हुए कल की कोई बुनियाद नहीं ,
तो आने वाले कल की कोई ठोस सबूत नहीं है।
अब बचा ही क्या इस जिंदगी में,
सिर्फ और सिर्फ आज…
शायद इस पल में भी सिर्फ तमन्नाओं से भरी है जिंदगी ,
और हम सिर्फ उसी के पीछे भाग रहे हैं।
ऐ मंजिलों के मुसाफिर….
कुछ ठहर भी जा,
थोड़ा-सा आराम भी तो कर ले।
और कुछ रफ़्तार अपनी धीमी कर ले,
और इस जिंदगी की असली खुशी का लुफ्त ले…।
जब मैं नन्हीं-सी परी थी।